Sunday, April 18, 2010

सौभाग्य पाने का सिद्धान्त

सर्वेषामेव दानानां ब्रह्मदानं विशिष्यते ।
वार्यन्नगोमहीवासस्लिकाञ्चनसर्पिषामफ ।। मनु. ।।
संसार में जितने दान हैं अर्थात जल , अन्न , गौ , पृथिवी , वस्त्र , तिल , सुवर्ण और घृतादि इन सब दानों से वेदविद्या का दान अतिश्रेष्ठ है । इसलिये जितना बन सके उतना प्रयत्न तन , मन , धन से विद्या की वृद्धि में किया करें । जिस देश में यथायोग्य ब्रह्मचर्य विद्या और वेदोक्त धर्म का प्रचार होता है वही देश सौभाग्यवान होता है । सत्यार्थ प्रकाश , तृतीयसमुल्लास
उद्गार - आज यह राष्ट्र जिन कठिन परिस्थितियों में घिरा हुआ है उसका एकमात्र कारण वेदों की फलदायिनी और मुक्तिदायिनी शिक्षाओं की अनदेखी करना है । वेदों में विश्वास व्यक्त करने वाली जनता ने भी वेदमार्ग को अपने जीवन में प्रत्यक्ष करने का क्या प्रयास किया ?
या अब ही क्या प्रयास कर रही है ? सौभाग्य की कुंजी वेदों में निहित है लेकिन कोई माने तब न । ऋषि दयानन्द सरस्वती ने जगत के कल्याण हेतु वेदमार्ग का ही सर्वत्र प्रचार किया परन्तु खेद का विषय है कि अधिकतर के लिए वेद आज तक रहस्य ही हैं । एक सूत्र भी कल्याण के लिए पर्याप्त है यदि उसे समर्पित भाव से सुना व ग्रहण किया जाए ।
अपने कल्याण के लिए , राष्ट्र के उत्थान के लिए वेदमार्ग अपनाइये ।

2 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

मनुस्मृति का यह बहुत ही सुन्दर श्लोक है!

दीर्घतमा said...

vedo me rashtriyata ka udghosh hai.
wayam rashtre jagrayam.
ved ki jankari ke liye
dhanyabad.